दिवाकर के इंतजार में
बित रही यह घोर कृष्ण निशा
टिमटिमाते तारों में
मैं ढूंढ रहा तुम्हें शशि
जब तुमसे मिलने की रह गई हैं आश मात्र
तो इन नुजूम में ढूंढ रहा हूँ अपना प्यारा नज्म़
ताकि बिता सकूँ शुकून से रात्रि के दो पहर ये
थक चुकी हैं अब आँखें ये
पर भूली नहीं है अब भी
बित गए आज के दो पहर निशा के
पौ फट गी है और ये आँखें भी बंद होने चली
पर हे! शशि रहेगा तुम्हारा इंतजार सदा
जब भी तुम लौट आओगे वापिस
पहर दो पहर न सही घडी़ दो घडी़ ही संग जरुर बिताएंगे।
✍️शैतान सिंह बिश्नोई